चेक बाउंस होने पर क़ानून (NI Act धारा 138) आपको सख़्त समय-सीमा देता है: चेक अपनी तारीख से 3 महीने के अंदर बैंक में लगा हो, बाउंस के रिटर्न मेमो से 30 दिन में लिखित माँग-नोटिस, नोटिस मिलने के 15 दिन चेक देने वाले को भुगतान के लिए, और उसके बाद 30 दिन में मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत। एक भी तारीख चूकी तो केस कमज़ोर या खत्म। दोषी पाए जाने पर 2 साल तक कैद और/या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, ट्रायल के दौरान 20% तक अंतरिम मुआवज़ा (धारा 143A) और अपील पर कम से कम 20% जमा (धारा 148)। नीचे का टूल आपकी तारीखों से हर डेडलाइन और रकम निकालता है।
चेक बाउंस समय-सीमा और सज़ा कैलकुलेटर
चेक की रकम और तारीखें भरें। टूल बताएगा आप किस चरण में हैं, अगली आखिरी तारीख कौन-सी है और कोर्ट से कितना जुर्माना/मुआवज़ा बन सकता है।
परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138/142/143A पर आधारित सामान्य जानकारी; क़ानूनी सलाह नहीं। नियम 14 अक्टूबर 2026 को जाँचे।
30-15-30 नियम: पूरी समय-रेखा
| कदम | समय-सीमा | धारा / नोट |
|---|---|---|
| चेक बैंक में लगाना | चेक की तारीख से 3 महीने | RBI निर्देश (1 अप्रैल 2012 से); बाद में लगा तो 138 नहीं |
| रिटर्न मेमो | बैंक देता है: “Funds insufficient”, “Payment stopped”, “Account closed” आदि | सभी कारण 138 में आते हैं (सिग्नेचर मिसमैच समेत, SC) |
| माँग-नोटिस | मेमो मिलने के 30 दिन में | धारा 138(b); रजिस्टर्ड पोस्ट/कूरियर + ईमेल, सबूत रखें |
| भुगतान की मोहलत | नोटिस मिलने के 15 दिन | धारा 138(c); भुगतान हो गया तो अपराध नहीं |
| शिकायत | 15 दिन खत्म होने के बाद 30 दिन | धारा 142(b); देरी “पर्याप्त कारण” पर माफ़ हो सकती है |
| कोर्ट कहाँ | जहाँ शिकायतकर्ता की बैंक शाखा है | धारा 142(2), 2015 संशोधन |
| समन → ट्रायल | समरी ट्रायल, लक्ष्य 6 महीने | धारा 143; असल में 1-3 साल* |
सज़ा, जुर्माना और मुआवज़ा
- धारा 138: 2 साल तक कैद, या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों; जुर्माने से शिकायतकर्ता को मुआवज़ा (CrPC/BNSS 357)।
- धारा 143A (2018): कोर्ट चेक की रकम का 20% तक अंतरिम मुआवज़ा ट्रायल के दौरान ही दिला सकता है (कोर्ट की मर्ज़ी, कारण सहित आदेश); 60 दिन में भुगतान, 30 दिन और बढ़ सकते हैं।
- धारा 148: दोषसिद्धि के बाद अपील पर कम से कम 20% जुर्माना/मुआवज़ा जमा करना पड़ता है।
- धारा 147: अपराध समझौते योग्य; लोक अदालत या कोर्ट में किसी भी चरण पर समझौता; समन के बाद देर से समझौते पर SC दिशानिर्देश के अनुसार 10-20% लागत लग सकती है*।
- कंपनी का चेक: कंपनी के साथ निदेशक/हस्ताक्षरकर्ता पर भी केस (धारा 141)।
शिकायत के साथ क्या लगाएँ
- चेक की मूल प्रति और बैंक का रिटर्न मेमो
- माँग-नोटिस की कॉपी, डाक रसीद और ट्रैकिंग/डिलीवरी रिपोर्ट
- कर्ज़/देनदारी का सबूत: इनवॉइस, एग्रीमेंट, WhatsApp/ईमेल
- शपथपत्र (धारा 145), वकालतनामा, कोर्ट फ़ीस (राज्य-वार; कुछ राज्यों में रकम का प्रतिशत)*
चेक बाउंस: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चेक बाउंस में कितनी सज़ा होती है? धारा 138 में 2 साल तक कैद, या चेक की रकम के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों। ज़्यादातर मामलों में कोर्ट जुर्माना और मुआवज़ा देता है; कैद पहली बार के मामलों में कम।
चेक बाउंस का नोटिस कब तक भेजना होता है? बैंक से रिटर्न मेमो मिलने के 30 दिन के अंदर लिखित नोटिस। 30 दिन निकल गए तो चेक (3 महीने की वैधता के अंदर) दोबारा लगाकर नया बाउंस कराएँ, नई सीमा शुरू होगी।
नोटिस के बाद केस कब करें? नोटिस मिलने के 15 दिन पूरे होने के बाद, अगले 30 दिन में (यानी 16वें से 45वें दिन के बीच) मजिस्ट्रेट कोर्ट में शिकायत।
केस कहाँ दर्ज होगा? जहाँ शिकायतकर्ता का बैंक खाता/शाखा है, उस इलाके के मजिस्ट्रेट कोर्ट में (धारा 142(2))।
चेक बाउंस केस में कितना मुआवज़ा मिलता है? ट्रायल के दौरान 20% तक अंतरिम (धारा 143A); फ़ैसले पर जुर्माने (रकम के दोगुने तक) से मुआवज़ा, साथ में ब्याज भी दिया जा सकता है।
नोटिस नहीं मिला, ऐसा बचाव चलेगा? सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा नोटिस मिला माना जाता है (धारा 27 GC Act, SC)। लौटा हुआ नोटिस भी “सेवित” माना जा सकता है।
क्या समझौता हो सकता है? हाँ, धारा 147 में अपराध समझौते योग्य है; लोक अदालत में या कोर्ट के बाहर पूरा भुगतान पर केस खत्म। जितना जल्दी, उतनी कम लागत।
सिक्योरिटी चेक बाउंस हो तो केस बनता है? अगर चेक की तारीख तक क़र्ज़/देनदारी बकाया थी तो हाँ, सिक्योरिटी चेक पर भी 138 लगता है (SC 2023)। देनदारी न होने का सबूत चेक देने वाले को देना होता है।
स्रोत (14 अक्टूबर 2026 को जाँचे): परक्राम्य लिखत अधिनियम 1881 धाराएँ 138-148 (2015 व 2018 संशोधन), RBI परिपत्र चेक वैधता 3 महीने (2012), Bajaj Finserv (अप्रैल 2026), Bhatt & Joshi Associates, LawSathi (2026) गाइड। कोर्ट फ़ीस, ट्रायल की अवधि और लागत राज्य/केस-वार*। यह सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं।
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